संपादक कुंज कुमार रात्रे
महासमुंद। “वतन की राह में वतन के नौजवां शहीद हो…” यह पंक्ति उन वीरों की कहानी कहती है, जिनके लिए देश की सुरक्षा से बढ़कर कुछ नहीं था। ऐसे ही एक साधारण परिवार में जन्मे असाधारण साहस के धनी थे बिरकोनी के घनश्याम कन्नौजे। हाथों में कभी मनिहारी का सामान लेकर गांव की गलियों में घूमने वाला यह नौजवान जब वर्दी में आया, तो देश की रक्षा को अपना धर्म मान लिया। बस्तर के घने जंगलों में नक्सलियों से मुठभेड़ के दौरान महज 23 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपना सर्वोच्च बलिदान दिया। 21 अगस्त 2026 को उनकी पंद्रहवीं पुण्यतिथि पर यह अंचल अपने उस वीर लाल को श्रद्धा और गर्व के साथ याद कर रहा है।
साल 2011 में एएसएफ की दूसरी बटालियन, सकरी बिलासपुर में आरक्षक क्रमांक 111 के रूप में पदस्थ घनश्याम कन्नौजे बीजापुर के भद्राकाली क्षेत्र में तैनात थे। 19 अगस्त को फोर्स की एक टुकड़ी कैंप के लिए रसद लेने निकली थी। जवानों को अंदाजा नहीं था कि जिस जंगल के रास्ते से वे गुजर रहे हैं, वहीं नक्सलियों ने घात लगा रखी है। अचानक बारूदी सुरंग में जोरदार विस्फोट हुआ। वाहन के परखच्चे उड़ गए और कई जवान घायल हो गए। विस्फोट के तुरंत बाद नक्सलियों ने तीन दिशाओं से अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। परिस्थितियां बेहद प्रतिकूल थीं, लेकिन जवानों ने हिम्मत नहीं छोड़ी। घायल होने के बावजूद उन्होंने मोर्चा संभाला और हमलावरों को मुंहतोड़ जवाब दिया। गोलियों और बारूदी विस्फोटों के बीच जवान आखिरी सांस तक लड़ते रहे। इस मुठभेड़ में 13 जवान शहीद हुए। उनमें बिरकोनी का वह नौजवान घनश्याम कन्नौजे भी था।
20 अगस्त को उनका पार्थिव शरीर मिला। अगले दिन, 21 अगस्त को बिरकोनी के हाईस्कूल परिसर में पूरे सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया। जिस विद्यालय में कभी घनश्याम ने पढ़ाई की थी, वही परिसर उस दिन उनके अंतिम विदाई का साक्षी बना। अपने वीर बेटे को अंतिम विदाई देने पूरा गांव उमड़ पड़ा था।
6 अक्टूबर 1988 को महासमुंद के समीप ग्राम बिरकोनी में जन्मे घनश्याम का बचपन किसी संपन्न परिवार में नहीं, बल्कि मेहनत और संघर्ष के बीच बीता। उनके दादाजी पुरानिक कन्नौजे सीमांत किसान थे। पिता गुलाब कन्नौजे खेती के साथ मनिहारी का सामान बेचकर परिवार का भरण-पोषण करते थे। घनश्याम ने बिरकोनी के शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय और महासमुंद के शासकीय आदर्श स्कूल में पढ़ाई की। पढ़ाई के साथ वे खेती में हाथ बंटाते और पिता के मनिहारी व्यवसाय में भी सहयोग करते थे। कई बार स्वयं मनिहारी का ठेला लेकर गांव की गलियों में घूमते थे।
जीवन की कठिनाइयों ने उनके हौसले को कमजोर नहीं किया। करीब 20 वर्ष की उम्र में उन्होंने फोर्स ज्वाइन की। गांव की गलियों में मनिहारी का सामान बेचने वाला यह युवक देखते ही देखते वर्दीधारी जवान बन गया। लेकिन नियति को शायद कुछ और ही मंजूर था। सेवा के कुछ ही वर्षों बाद, 23 वर्ष की उम्र पूरी होने से पहले, उन्होंने देश की रक्षा करते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। गांव आया तो तिरंगे में लिपटकर।
शहीद घनश्याम कन्नौजे की स्मृति आज भी बिरकोनी में उतनी ही जीवंत है। स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस और 21 अक्टूबर पुलिस दिवस के अवसर पर पुलिस जवान, नागरिक, शिक्षक-शिक्षिकाएं और विद्यार्थी उनकी प्रतिमा पर श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं। बिरकोनी के हाईस्कूल परिसर में स्थापित उनकी प्रतिमा आज भी आने-जाने वालों को उनके बलिदान की याद दिलाती है। इससे भी आगे बढ़कर गांव के श्रीराम-जानकी मंदिर सहित अनेक देवालयों में उनके छायाचित्र लगाए गए हैं। धार्मिक स्थलों में सहेजी गई उनकी तस्वीरें इस बात की गवाही देती हैं कि शहीद घनश्याम केवल परिवार या गांव के नहीं, बल्कि पूरे अंचल के गौरव हैं।
उनकी शहादत को याद करना केवल अतीत को स्मरण करना नहीं है। यह आने वाली पीढ़ियों को यह बताना भी है कि देश की सुरक्षा और सम्मान के लिए कुछ लोग अपना आज कुर्बान कर देते हैं, ताकि देश का कल सुरक्षित रहे। बिरकोनी की मिट्टी ने मनिहारी का सामान बेचने वाले जिस साधारण से बेटे को जन्म दिया था, उसी बेटे ने असाधारण साहस के साथ देश के लिए अपना जीवन अर्पित कर दिया। घनश्याम कन्नौजे आज भी इस अंचल के लिए केवल एक शहीद नहीं, बल्कि उस मिट्टी की अमर पहचान हैं, जिसने उन्हें जन्म दिया।