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“मैं… इन्हें छोड़कर नहीं जाऊँगी…” ऐसा उसने खुद से कहा।

रिपोर्टर कुंज कुमार रात्रे महासमुन्द*”चीत्कार..शहर की एक तंग सड़क पर पक्के मकानों की ठसाठस मौजूदगी के बीच इकलौता पुराना नीम का पेड़ सुकून और उम्मीद की शाखाएँ लहराते अब भी खड़ा था।

उस पेड़ की एक टहनी पर पंछियों का एक जोड़ा आया। नर था चिन्ना और मादा थी पाखी। उनके दाम्पत्य जीवन की अभी शुरुआत हो रही थी।

“यहीं ठीक रहेगा।” चिन्ना ने चोंच में दबा सूखा तिनका रखते हुए कहा।

पाखी ने चारों ओर देखा और कहा – “हाँ… यह टहनी सबसे अच्छी रहेगी।”

दोनों मिलकर घोंसला बनाने लगे, तिनका-तिनका चुनकर, पूरे मन से, धैर्य से।

कुछ देर बाद पाखी धीमे से बोली – “तुम्हें याद है, पहले यहाँ कितने सारे पंछी हुआ करते थे?”

चिन्ना ने गर्दन झुका ली। कहा – “हाँ… हर छत, हर आँगन में… लेकिन अब…”

“अब?” पाखी ने पूछा।

चिन्ना बोला – “अब पेड़ कहाँ हैं, ऊँची-ऊँची बिल्डिंगें हैं, टॉवर हैं, धुआँ है, शोर है। पंछियों के वो झुंड, वो चहचहाहट सब गायब है।”

पाखी कुछ क्षण चुप रही। फिर बोली – “हमारी टोली में से ही कितने लापता हो गए, पता नहीं वो जिंदा हैं भी कि नहीं। अपनों की चहचहाहट सुनने के लिए तो हम ही तरस गए हैं।”

चिन्ना ने उसकी ओर देखा और कहा – “दुखी न हो पगली, हमारे आने वाले बच्चे, यहाँ फिर से चहचहाहट भरेंगे।”

पाखी की आँखों में उम्मीद चमक उठी। बोली – “हाँ… हम अपना छोटा-सा संसार गढ़ेंगे, चहचहाहट से भरा।”

दिन बीतते गए। घोंसला तैयार हुआ… सुंदर, सुरक्षित और जीवन से भरा। और एक सुबह…पाखी ने तीन छोटे-छोटे अंडे दिए।

वह उन्हें अपने पंखों के नीचे छुपाकर बैठ गई। उसकी आँखों में माँ बनने की शांति और संतोष था।

चिन्ना पास ही बैठा था। बोला – “अब कुछ ही दिनों में… हमारे बच्चे…”

“हाँ…” पाखी मुस्कुराई। बोली – “और यहाँ फिर से चिंव-चिंव गूँजेगा… चहचहाहट होगी, कलरव गान होगा।”

तभी… दूर कहीं से एक अजीब-सी धुन सुनाई दी।

ढम-ढम… धड़ाम… तेज़ बास की थरथराहट…

चिन्ना ने सिर उठाया। “क्या हो रहा है?” ध्यान से सुना –

“लगता है… लोगों का कोई जश्न है… शायद बारात…”

आवाज़ धीरे-धीरे बढ़ने लगी। धड़कनों की तरह नहीं, झटकों की तरह।

पाखी बेचैन हो उठी। कहने लगी – “मेरे अंडे… इन्हें कुछ हो तो नहीं जाएगा?”

चिन्ना ने उसे शांत करने की कोशिश की – “तुम बस इन्हें गर्म रखो… मैं देखता हूँ…।”

अब गली में रोशनी चमकने लगी। लोग नाच रहे थे, झूम रहे थे।

पटाखों की तेज आवाज हो रही थी, धड़ाम… धड़ाम…! डीजे का भयानक शोर कानों को चीरने लगा था।

बारात अब ठीक उसी पेड़ के पास आ गई। पाखी का छोटा-सा शरीर काँपने लगा। उसने अपने पंख फैलाकर अंडों को ढँक लिया।

“मैं… इन्हें छोड़कर नहीं जाऊँगी…” ऐसा उसने खुद से कहा।

शोर और बढ़ गया। पाखी ने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं। उसने पंखों से अपने कान के छिद्र ढँकने की कोशिश की।

पेड़ की टहनियाँ तक काँप रही थीं। चिन्ना पास की टहनी पर बैठा चिल्लाया – “पाखी! बाहर आओ! ये बहुत खतरनाक है!”

“नहीं!” पाखी घोंसले के अंदर से चीखी। कहा – “मेरे बच्चे हैं… मैं इन्हें छोड़कर नहीं जाऊँगी!”

अब डीजे ठीक नीचे था। भयानक शोर, बास की तरंगें सीधे घोंसले को भेद रही थीं।

पाखी का संतुलन डगमगाने लगा। उसका दिल तेज़ धड़क रहा था। फटाखे का एक तेज़ धमाका हुआ – धड़ाम!!!

और उसी क्षण…पाखी की सहनशक्ति टूट गई। ममता और भय के बीच… भय जीत गया। हड़बड़ाकर वह पूरी ताकत से वह ऊपर की ओर उछली और घोंसले से उड़ गई।

काफी देर तक गली में नाच-गाना चलता रहा। फिर धीरे-धीरे बारात आगे बढ़ गई। शोर कम हुआ।

पाखी काँपते हुए वापस आई। उसका दिल धड़क रहा था—

“सब ठीक हो… सब ठीक हो…”

वह घोंसले में जैसे ही पहुँची, उसका कलेजा फट गया। घोंसले में उसके तीनों अंडे टूट चुके थे।

यह देखकर पाखी पर क्या बीती होगी, इसका अंदाजा कोई ममता से भरा हृदय से ही लगा सकता है।

“मेरे बच्चों! यह क्या हो गया? यह क्या हो गया?” कहते-कहते वह उन अंडों पर झुक गई, जैसे उन्हें फिर से जोड़ देना चाहती हो। लेकिन ऐसा हो नहीं सकता था। उसने सिर ऊपर उठाकर देखा, चिन्ना भी शाख पर बेबस बैठा था।

ममता चीत्कार उठी। लेकिन यह चीख, उस उजड़ते घोंसले और

उस नीम की टहनियों से टकराकर शून्य आसमान में गुम हो गई। दूर…किसी चौराहे पर… डीजे अब भी बज रहा था। और लोग… अब भी नाच रहे थे।

✍️ कहानी – *ललित मानिकपुरी,* महासमुंद (छ.ग.)

मो. – 9752111088

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