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सुधार हेतु सतनाम संस्कृति की रीति नीति की पालन जरूरी है

विवाह कार्यक्रम सतनाम संस्कृति के रीति-नीति के अनुसार हो और रुढ़िवादी प्रथा को त्याग कर सुधार की जरूरत

रिपोर्टर कुंज कुमार रात्रे महासमुन्द सतनामी समाज के वैवाहिक कार्यक्रमों में सुधार की जगह सामाजिक कुरीतियां बढ़ रही है जो चिंतनीय है। सतनाम धर्म के प्रवर्तक परम पुज्य गुरु घासीदास बाबा जी ने सतनाम संस्कृति के आधार पर आदर्श रीति नीति दें गये है। परंतु समय के साथ समाज में विभिन्न संस्कार कार्यक्रमो में अन्य धर्मों की रीति -नीति के समावेश हो रही है। जिसमें सतनामी समाज के विवाह संस्कारों में सुधार की जगह सामाजिक कुरीतियां बढ़ रही है।

सगाई में भारी भरकम भीड़ की खर्चीली आर्थिक बर्बादी से शुरू होकर हिंदुत्व रीति नीति की चलन लड़की लड़के के कुंडली मिलान करना और हिंदुत्व पंचाग के मुहुर्त से ही विवाह तिथि तय करने की प्रथा कर्मकांडी शादी में तब्दील होती जा रही है। खासकर एक लगन वाली विशेष तिथि में शादी करने से वस्तुओं की मुल्यों में अनाप-शनाप बढ़ोतरी व वाहनों की कमी से आर्थिक बोझ और बढ़ जाती है।सतनाम संस्कृति के अनुसार विवाह के प्रथम दिवस मड़वा में जैतखाम या स्वच्छ जगह से दीप जलाकर मिट्टी लाई जाती है। जिसमें गौरा गौरी पुजा वर्जित है। फिर भी समाज में इसके उल्टा अधिकांश लोग चुलमाटी के समय गोबर व आटा के गौरा गौरी बनाकर पुजा करते है। दुसरे दिवस मातृ पुजा के तहत मायन भरने की प्रथा को चला रहे हैं जबकि सतनाम संस्कृति में गुरु पुजा के तहत कलश स्थापित कर दुल्हन या दुल्हा के ऊपर तेल हल्दी चंदन की लेप चढ़ाई जाती है। आज के समय में खासकर रायपुर संभाग में जो सबसे बड़ी जगहसाई का कारण बन रही है वो समय में बाराती का नहीं पहुंचना या समय पर बाराती पहुंच जाती हैं तो समय में भोजन नहीं कराना,समय में बारात नहीं परघाना (स्वागत) है। बहुत से जगहों में तो बाराती को रात भर बिठाकर दुसरे दिन सुबह परघाया जा रहा है। और भांवर व टिकावन के बिदाई दिन के बारह-एक बजे हो रही है। जिससे गाड़ी कि दोगुनी किराया ,समय की बर्बादी अलग हो रही है। अन्य समाज के लोग इसे उपहास के तौर पर बखान करते हैं। जिसके कारण दोस्त यार या जान पहचान के बारात जाने वाले इच्छुक अन्य समाज के लोगो को लें जाने में भी अपनी इज्जत का बखेड़ा उधेड़ना है।वर वधू के भावंर घुमने टीकावन के समय बैठने व विदाई के समय दिशा भाद्रा को लेकर भी खींच तान होती है। ज्यादातर शुभ अशुभ के आधार पर दिशा तय करते हैं। अभी एक शादी समारोह में भांवर के लिए पुरने वाली चौंक को लेकर दोनों पक्षों में खींचतान हो गई थी। एक पक्ष चावल आंटे से चौंक पुरने की बात पर अडिग था तो दुसरा पक्ष धान के चौंक पुरने की बात पर बहसबाजी कर रहे थे। दोनों पक्ष अपने अपने क्षेत्र की रीति नीति अलग अलग चलन की भी बात कर रहे थे।मतलब समाज में रिती-नीति में भी कोई एकरुपता नहीं होने से यह परिस्थिति निर्मित हो रही है। बहुत से जगहों पर दुल्हा दुल्हन की गांठ छोड़ाने की रस्म अदायगी की राशि को लेकर भी विवाद की स्थिति पैदा हो जाती हैं। कुछ जगहों पर तो कुल टिकावन की योग के प्रतिशत तय कर रखें है तो कुछ क्षेत्रों में औने पौने राशि की मांग की जाती।जो उचित नहीं है।वहीं कुछ सतनामी बहु के घर प्रवेश पर बलि देने की प्रथा चलाते हैं।जो सतनाम संस्कृति को शर्मशार करतीं हैं। कुछ लोग तो अब ब्राम्हण पंडित बुलाकर साकोचार पढ़ाने की नई प्रथा शुरू कर दिए हैं तो कुछ लोग बौद्ध भिक्षु बुलाकर बौद्ध धर्म के रीति-रिवाज से शादी कर रहे। समाज में सांस्कृतिक एकरुपता विघटन की ओर बढ़ रहीं है। सगाई व घर देखाई में कुछ लोग सार्वजनिक रूप से मांस मदिरा परोस रहे हैं। जिसके कारण नशापान में बेटी की रिश्ता तय करने से सही रिश्ता का चयन न होने के कारण बेटी की घर तो बर्बाद हो रही है। वहीं नशापान के कारण बातचीत में टकराव व लड़ाई झगड़े की घटनाएं पुलिस थाने तक पहुंचने से समाज की फजीहत अलग हो रही है। विवाह के किसी भी कड़ी में सार्वजनिक मांस मदिरा का परोसना पूर्ण वर्जित होनी चाहिए।

सुधार हेतु सतनाम संस्कृति की रीति नीति की पालन जरूरी

समाज में वास्तविक बदलाव के लिए विवाह कार्यक्रम में सतनाम संस्कृति का पालन करने व प्रदेश स्तर पर रीति नीति में एकरुपता लाने के नियमावली बनाई जानी चाहिए। सगाई कार्यक्रम को सादगी के साथ भीड़ वाली सगाई बाराती ना लाकर सीमित संख्या में लाने की जरूरत ताकि लड़की व लड़का दोनों पक्षों की आर्थिक बोझ कम पड़े।चुलमाटी जैतखाम के पास दीप प्रज्ज्वलित कर आरती मंगल कर घर लाएं। वहीं बाराती पांच से सात बजे तक कन्या पक्ष के घर पहुंच जानी चाहिए और सही समय में भोजन कराने के बाद या पहले बाराती को परघाया जाना चाहिए। ताकि गांव के सभी लोग देख व शामिल हों सके।बारह एक बजे रात तक सारी रस्म अदायगी हो जाएं तो और बेहतर है। यदि रात में संभव ना हो तो दुसरे दिन सुबह ही कन्या विदाई हो जानी चाहिए।वर वधू के गांठ छोड़वानी प्रथा बहनों के मांग पर दुल्हा के स्वेच्छा पर वस्तु स्थिति को देखते हुए दोनों पक्षों की सहमति पर हो।विवाह समारोह में दोनों पक्षों के लोगों को नशापान से दूर रहना चाहिए।हर संस्कार रीति-नीति पुरे छत्तीसगढ़ में एक समान हों जिससे किसी भी क्षेत्र में विवाद की स्थिति निर्मित ना हो।परम पुज्य गुरु घासीदास बाबा जी कर्मकांड का विरोध किया है। सभी दिनों व दिशाओं को शुभ बताया है।लगन पात्रा शुभ अशुभ के चक्कर से समाज को बचने की सीख विरासत में मिलीं है इसलिए हमें कर्मकांड से बचकर सतनाम संस्कृति को मानने की जरूरत है। वहीं जीव बलि किसी भी कीमत में स्वीकार नहीं है। यदि जीव बलि व लगन पात्रा से कथित शुभ मुहूर्त लाभकारी होती तो फिर कुछ ही दिनों में लड़की लड़का का सम्बन्ध विच्छेद नहीं होती।यह सब कर्मकांड है जिसे त्याग करने की जरूरत है।वर वधू की विदाई पर माऊर सौंपने के बाद मां द्वारा स्तनपान कराया जाना भी उचित नहीं है ये असहजता पैदा करती है जिसे बंद किया जाना चाहिए।

महंगी शादी से बचकर आदर्श विवाह को प्राथमिकता देने की जरूरत

समाज को महंगी शादी से भी बचने की जरूरत है। कुछ लोग एक दूसरे की देखा सीखी अपनी कमाई की सारी जमा पूंजी को महंगी शादी में खर्च कर दें रहें हैं तो कुछ स्थाई संपत्ति को बेचकर शादी में खर्च कर रहे हैं।इस प्रकार बच्चों के भविष्य के साथ धोखा कर रहे हैं। इस देखा सीखी में आर्थिक रूप से कमजोर लोग भी चढ़ शादी करने की जिद करते हैं।जितना ज्यादा हो सकें आदर्श विवाह को तवज्जो दें और अपनी जमा पुंजी को भविष्य के लिए सुरक्षित रखें।इसके लिए जितने भी सामाजिक संगठन समिति के पदाधिकारी अपने बच्चों रिस्तेदारो की शादी आदर्श रूप से करें। ताकि समाज के अन्य लोग अनुकरण करने प्रोत्साहित हो।आइए हम सब मिलकर अच्छाई को अपनायें और कर्मकांड का त्याग करें।

 

 

 

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