रिपोर्टर कुंज कुमार रात्रे
महासमुंद – युजीसी समता नियम को लेकर देशभर में हो रही चर्चा के बीच जिला के अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति व पिछड़ा वर्ग के सामाजिक प्रमुखों की संयुक्त बैठक साहु सदन बीटीआई रोड़ में रखा गया जिसमें छत्तीसगढ़िया सर्व समाज महासंघ के जिलाध्यक्ष बसंत सिन्हा ने राजपत्र में प्रकाशित युजीसी समता नियम को विस्तृत रूप से बताते हुए कहा कि विश्वविद्यालय में एससी एसटी ओबीसी समाज के छात्रों व कर्मचारियों के साथ होने वाले जातिगत भेद-भाव को रोकने के लिए कारगार होगी। चुंकि एससी एसटी वर्ग के छात्रों के लिए एक्ट्रोसिटी एक्ट तो पहले से है लेकिन पहली बार पिछड़ा वर्ग व सभी वर्ग के दिव्यांग को शामिल किया गया गया है।वास्तविक में विभिन्न आंकड़ो के आधार पर पिछड़ा वर्ग के साथ शैक्षणिक संस्थानों व अन्य जगहों में जातिगत भेद-भाव होती आ रही है। जिसके कारण युजीसी की कमेटी ने ओबीसी वर्ग को भी शामिल किया है। लेकिन जब भी पिछड़ा वर्ग की हिस्सेदारी की बात होती है तब तब सामान्य वर्ग के विशेष जाति के लोग विरोध करता है। चाहे मंडल आयोग का हो या मध्यप्रदेश छत्तीसगढ़ में 27 प्रतिशत आरक्षण का हो और अब
इस युजीसी समता नियम को रोकने के लिए मिडिया के असमतावादी एंकरो और देश के एक वर्ग विशेष के कुछ लोगों ने अनावश्यक सर्वण विरोधी माहौल बनाया। जिसके कारण सुप्रीम कोर्ट को सरकार के पक्ष सुने बगैर इस पर रोक लगाना पड़ा।
बैठक को दीपक साहू, द्रोण चंद्राकर,मुन्ना साहु, एसपी ध्रुव, दिनेश बंजारे, डमरू मांझी, मीना वर्मा, विजय बंजारे, सुरेंद्र ठाकुर,टोमन कागजी एम एल ध्रुव , कल्पना सुर्यवंशी,बी पी मेश्राम,योगेश साहु ने भी संबोधित करते हुए कहा कि देश में आजादी के पहले से ही हमारे बहुसंख्यक समाज एससी एसटी ओबीसी भेद-भाव का शिकार होते रहा है। आज आजादी के बाद भी देश के सरकारी नौकरियों पर हमारी भागीदारी जनसंख्या के आधार पर नहीं मिल पा रही है। शैक्षणिक संस्थानों में जातिगत भेद भाव 118% बढ़ोतरी हुई है। वहीं सचिव स्तर पर हमारे एससी एसटी ओबीसी वर्ग के अधिकारीयों को पहुंचने नहीं दिया जाता है। केंद्रीय विश्वविद्यालय में ही अनुसूचित जाति वर्ग के 64% अनुसूचित जनजाति के 83% व पिछड़ा वर्ग के 80% पद खाली पड़े हैं जबकि इसके उल्ट सामान्य वर्ग के पद पर 10 से 15 प्रतिशत संख्या वाले लोगों की 80 प्रतिशत पद पर भरी हुई है। जिसमें चुनिंदा जाति के लोग ही काबिज है।इसी प्रकार प्रोफेसर,वाइस चांसलर के पदों पर हमारे तीनों वर्गों की उपस्थिति नगण्य है।
यह मसौदा एकाएक नहीं लाई गई है बल्कि मृतक रोहित वेमुला, मृतक पायल ताड़वी की माताओं की याचिका पर सुनवाई के दौरान ही सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने ऐसे मौतों को संस्थागत मौत बताते हुए यूजीसी को कड़े मसौदे तैयार करने की निर्देश दिया। जिस पर केंद्रिय शिक्षा मंत्री,युजीसी के चेयरमैन, लोकसभा व राज्यसभा के सांसदो की स्थाई समिति ने तैयार की हैं तथा अधिकांश सदस्य सामान्य वर्ग के रहे हैं। और यदि किसी भी वर्ग के छात्र व विद्यार्थी के साथ जातिगत भेद-भाव होती है तो एससी-एसटी ओबीसी वर्ग के प्रतिनिधि के साथ अन्य सदस्य भी शामिल होंगे। अन्य सदस्य में सामान्य वर्ग के प्रतिनिधि भी रहेगी क्योंकि विश्वविद्यालयों में ज्यादातर वाइस चांसलर, प्रोफेसर तो सामान्य वर्ग के है।
बैठक में उपस्थित पदाधिकारियों ने एक स्वर में इस बिल का समर्थन करते हुए प्रधानमंत्री, शिक्षा मंत्री व युजीसी के चेयरमैन को धन्यवाद ज्ञापित करते उनके नाम से कलेक्टर महासमुंद को छत्तीसगढ़ीया सर्व समाज के बैनर में एससी एसटी ओबीसी वर्ग के द्वारा संयुक्त रूप से 4 फरवरी बुधवार को तीन बजे ज्ञापन सौंपने का निर्णय लिया है।साथ ही इस नियम पर रोक हटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को पत्र लिखकर मांग करेंगे।साथ ही तीनों वर्गों के लोगों को ज्ञापन कार्यक्रम में अधिक से अधिक संख्या में शामिल होने अपील की गई है।
बैठक में उपरोक्त पदाधिकारियों के अलावा,मधु यादव, मुलचंद रौतिया, रामकृष्ण मिरी, राजेश रात्रे, नंदकुमार कोसरे,रेखराम बघेल, संतराम कुर्रे शामिल रहे।